जहाँ चाहे जाता हूँ ,
अपनी जिंदगी जीता हूँ...
जीते जीते सोचता हूँ
है कितने दिन है और जीना...
तुम मनुष्य तो मनुष्य हो
लेकिन तुम्हें चाहिये ,
हर किसीका सर खाना
और तकलीफ देके
उनका बहूत खून पीना...
अरे निकम्मों,
जरा बहाओ पसीना ,
लाओ चार पैसे घर में...
फिर समझ में आएगी ,
कैसी होती है जिंदगी ,
कैसा होता है वो जीना...

